भीड़

भीड़

व्यस्त, व्यस्त, व्यस्त
आंख खुली,समाचार-पत्र
ध्यान नहीं अन्यत्र
शरीर कसमसाया
शुरू हुई दिनचर्या
रोजी-रोटी की, भागदौड़
एकरस, गुणा-जोड़
दिन भर, काम ही काम
कब ले, कोई विश्राम
दिन ढला, हुई शाम
“टी.वी.” देख, मिटे थकान
बीत रहे घंटे पे घंटे
यूं ही रात के ग्यारह बजे
जरूरी “नेट” पर गुफ्तगू
होने जमाने से रूबरू
नींद पूरी होती नहीं
इतर कुछ, कैसे, करे कोई
चौबीस घंटों में
ऐसे पल निश्चित आते
जब
किशोरवय के सपने छटपटाते
सच्चे और झूंठे
बहानों के बीच
तदबीर और तकदीर
छलावों के बीच
सपनों को दबा
औसत इंसान बन जाते
भीड़ में जमा हो जाते।।

विधु गर्ग